गजल

- नवराज बुढा "नवीन उदासी"

यो मनभित्र आंधी चलेकै छ|
उनको यादले मन जलेकै छ|

भन्न केहि सक्दिन कसैलाई,
मनभरी पिरको आगो बलेकै छ|

कहांबाट भेट भयो आज हाम्रो,
समिपमै यी आँखाहरु छलेकै छ|

जब उनको आनाकानी बुझ्दै गएँ,
बेहोसीमा नै मन मेरो धलेकै छ|

प्रकाशित मिति : प्रकाशन मिति : शनिवार, 29 मङ्गसीर, 2070

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